1 अप्रैल 1936 से वर्तमान तक का सफर1 अप्रैल 1936 भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम दिन था जब ‘ओडिशा’ (तब ओड़िशा) भाषाई आधार पर गठित होने वाला भारत का पहला प्रांत बना । ब्रिटिश काल के दौरान बिहार और ओडिशा प्रांत से अलग होकर एक स्वतंत्र पहचान बनाना, ओड़िया अस्मिता की सबसे बड़ी जीत थी ।
- भाषाई आंदोलन और राज्य का गठन (1903 – 1936)ओडिशा के गठन की कहानी 1936 से बहुत पहले शुरू हो गई थी। मधुसूदन दास, महाराजा कृष्ण चंद्र देव और पंडित नीलकंठ दास जैसे दिग्गजों ने ‘उत्कल सम्मलीनी’ के माध्यम से बिखरे हुए ओड़िया भाषी क्षेत्रों को एक करने की मुहीम चलाई।साइमन कमीशन और गोलमेज सम्मेलन: महाराजा कृष्ण चंद्र देव ने लंदन में गोलमेज सम्मेलनों के दौरान ओड़िया भाषियों की मांगों को बड़ी दृढ़ता से रखा।ऐतिहासिक घोषणा: लंबे संघर्ष के बाद, 1 अप्रैल 1936 को बिहार और ओडिशा प्रांत से अलग कर ओडिशा का निर्माण किया गया । उस समय इसमें कटक, पुरी, बालेश्वर, संबलपुर, गंजम और कोरापुट जैसे मुख्य जिले शामिल थे।
- स्वतंत्रता और रियासतों का विलय (1947 – 1950)1947 में भारत की आजादी के बाद, ओडिशा के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसके आसपास की 26 रियासतों (Garhjat States) का विलय करना था।सरदार पटेल की भूमिका: लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने कटक में राजाओं के साथ बैठक की।एकीकरण: 1948 और 1949 के दौरान मयूरभंज समेत लगभग सभी रियासतें ओडिशा का हिस्सा बन गईं।नई राजधानी: 1948 में राज्य की राजधानी को ऐतिहासिक शहर कटक से बदलकर सुनियोजित शहर भुवनेश्वर स्थानांतरित कर दिया गया।
- आधुनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण (1950 – 1980)आजादी के बाद ओडिशा ने अपनी प्राकृतिक संपदा का उपयोग कर आधुनिक भारत की नींव रखने में मदद की।हीराकुड बांध (1957): महानदी पर बना यह बांध दुनिया के सबसे लंबे मिट्टी के बांधों में से एक है। इसने राज्य में सिंचाई और बिजली उत्पादन की नई क्रांति शुरू की।राउरकेला स्टील प्लांट (1959): जर्मनी के सहयोग से बना यह भारत का पहला सार्वजनिक क्षेत्र का इस्पात कारखाना था, जिसने ओडिशा को औद्योगिक मानचित्र पर स्थापित किया।पारादीप पोर्ट (1966): तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा नींव रखे जाने के बाद, यह बंदरगाह पूर्वी भारत के व्यापार का मुख्य केंद्र बना।
- आपदाओं से लड़ता ओडिशा (1999 का महाचक्रवात)ओडिशा के इतिहास में 29 अक्टूबर 1999 का दिन एक काला अध्याय था। एक भीषण महाचक्रवात ने राज्य के तटीय इलाकों को तबाह कर दिया, जिसमें लगभग 10,000 लोगों की जान गई।”इस आपदा ने राज्य की आर्थिक कमर तोड़ दी थी, लेकिन यहाँ के लोगों के अदम्य साहस ने फिर से खड़े होने की प्रेरणा दी।”इस घटना के बाद ओडिशा ने अपनी आपदा प्रबंधन प्रणाली को इतना मजबूत किया कि आज ‘संयुक्त राष्ट्र’ (UN) भी चक्रवातों के दौरान “शून्य हताहत” (Zero Casualty) नीति के लिए ओडिशा की सराहना करता है।
- आर्थिक और औद्योगिक क्रांति (2000 – वर्तमान)21वीं सदी में ओडिशा “गरीब राज्य” की छवि तोड़कर “भारत का नया निवेश केंद्र” बनकर उभरा है।लौह और इस्पात का हब: भारत के कुल लौह अयस्क उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा ओडिशा से आता है। टाटा स्टील, जिंदल और वेदांता जैसे समूहों ने यहाँ भारी निवेश किया है।आईटी और शिक्षा: भुवनेश्वर आज ‘पूर्वी भारत का आईटी हब’ (IT Hub) माना जाता है, जहाँ इंफोसिस, टीसीएस और विप्रो जैसी कंपनियों के बड़े कैंपस हैं। साथ ही IIT, AIIMS और NISER जैसे संस्थान इसे शिक्षा का केंद्र बनाते हैं।खेलों की राजधानी: ओडिशा ने खुद को ‘भारत की खेल राजधानी’ के रूप में स्थापित किया है। यहाँ लगातार दो बार (2018 और 2023) पुरुष हॉकी विश्व कप का सफल आयोजन हुआ।
- सांस्कृतिक गौरव और नाम परिवर्तनराज्य ने अपनी प्राचीन जड़ों को सम्मान देने के लिए महत्वपूर्ण बदलाव किए:नाम में बदलाव (2011): 4 नवंबर 2011 को आधिकारिक तौर पर राज्य का नाम ‘Orissa’ से ‘Odisha’ और भाषा का नाम ‘Oriya’ से ‘Odia’ कर दिया गया।शास्त्रीय भाषा: 2014 में ओड़िया को भारत की छठी शास्त्रीय भाषा (Classical Language) का दर्जा मिला।
निष्कर्ष1936 में एक छोटे से प्रांत के रूप में शुरू हुआ ओडिशा आज अपनी प्राकृतिक आपदाओं को हराते हुए, अपनी कला (पट्टचित्र, ओडिसी) और संस्कृति को संजोते हुए भारत की प्रगति का इंजन बन चुका है। हीराकुड की लहरों से लेकर चांदीपुर के मिसाइल परीक्षण केंद्र तक, ओडिशा की कहानी निरंतर संघर्ष और शानदार विजय की कहानी है।